India First AC Train: भारत में करीब 95 साल पहले चली थी फर्स्ट AC ट्रेन, कोचों को ठंडा रखने के लिए किया गया था ये जबरदस्त जुगाड़ - Trading Research

India First AC Train: भारत में करीब 95 साल पहले चली थी फर्स्ट AC ट्रेन, कोचों को ठंडा रखने के लिए किया गया था ये जबरदस्त जुगाड़

SB News Digital Desk : देश में मोदी सरकार के आने के बाद से इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की दिशा में काफी काम देखने को मिल रहा है. भारतीय रेलवे भी इससे अछूता नहीं है. पिछले कुछ सालों में भारतीय रेलवे में ऐसे सुधार किए गए हैं, जिससे वह भी अब काफी अडवांस हो गई है. देश में सबसे तेज स्पीड से चलने वाली वंदे भारत ट्रेनें शुरू हो चुकी हैं. साथ ही बुलेट ट्रेनों के निर्माण का भी काम चल रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में चली पहली एसी ट्रेन कौन सी थी. उस ट्रेन में डिब्बों को ठंडा रखने के लिए किस तकनीक का इस्तेमाल किया गया था.

भारतीय रेलवे के अधिकारियों के मुताबिक भारत में चली पहली एसी ट्रेन (India First AC Train) का नाम गोल्डन टेंपल मेल (फ्रंटियर मेल) थी. वह ट्रेन अंग्रेजों के जमाने में चलाई गई थी. अंग्रेजी सरकार ने 1 सितंबर 1928 को इस ट्रेन को पहली बार चलाया था. उस जमाने में इसका नाम फ्रंटियर मेल (Frontier Mail) हुआ करता था, जिसे अब गोल्डन टेंपल मेल के नाम से जाना जाता है. यह ट्रेन मुंबई सेंट्रल से लाहौर तक चलती थी. आजादी के बाद इस ट्रेन को मुंबई से अमृतसर तक सीमित कर दिया गया.

भारतीय रेलवे के अधिकारियों के मुताबिक भारत में चली पहली एसी ट्रेन (India First AC Train) का नाम गोल्डन टेंपल मेल (फ्रंटियर मेल) थी. वह ट्रेन अंग्रेजों के जमाने में चलाई गई थी. अंग्रेजी सरकार ने 1 सितंबर 1928 को इस ट्रेन को पहली बार चलाया था. उस जमाने में इसका नाम फ्रंटियर मेल (Frontier Mail) हुआ करता था, जिसे अब गोल्डन टेंपल मेल के नाम से जाना जाता है. यह ट्रेन मुंबई सेंट्रल से लाहौर तक चलती थी. आजादी के बाद इस ट्रेन को मुंबई से अमृतसर तक सीमित कर दिया गया.

भारत की पहली एसी ट्रेन (India First AC Train) के रूप में चर्चित फ्रंटियर मेल (Frontier Mail)में खास तरह की बर्थ, चेयर और टॉयलेट की सुविधा थी. उस कोच में पंखे और लाइट का भी इंतजाम था. कहते हैं कि वह उस वक्त की सबसे तेज चलने वाली ट्रेन हुआ करती थी. एक बार की बात है. वह ट्रेन करीब 15 मिनट लेट हो गई थी. जिस पर बवाल मच गया था. अंग्रेज अधिकारियों ने इसे गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दे दिए थे. इसके बाद देरी के जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी की गई थी. 
 

 

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